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वृंदावन की कथाएँ

लीला, संत-चरित और तीर्थ-कथाएँ — जो सुनने से ही मन वृंदावन पहुँच जाता है।

सभी कथाएँ(11)

कृष्ण जन्म

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कंस के कारागार में देवकी और वसुदेव के यहाँ भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। भगवान ने पहले चतुर्भुज विष्णु रूप में दर्शन दिए और फिर माता-पिता की प्रार्थना पर बालक का रूप धारण किया। वसुदेव श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल पहुँचे और उन्हें नंद महाराज के घर यशोदा के पास पहुँचा दिया।

पूतना मोक्ष

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कंस ने बालक श्रीकृष्ण का वध करने के लिए पूतना नामक राक्षसी को गोकुल भेजा। सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वह नंद-भवन पहुँची और विष लगे स्तन से शिशु कृष्ण को दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण ने दूध के साथ उसके प्राण भी खींच लिए — किंतु स्तनपान कराने के कारण उसे माता की गति और मोक्ष प्राप्त हुआ।

यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन

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बालक कृष्ण पर मिट्टी खाने का आरोप लगा। माता यशोदा ने डाँटकर उनसे मुँह खोलने को कहा। जब श्रीकृष्ण ने मुँह खोला, तो यशोदा ने उसमें मिट्टी नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्मांड देखा — लोक, नक्षत्र, दिशाएँ और स्वयं गोकुल तथा अपने आपको भी। भगवान ने योगमाया से उस स्मृति को ढँक दिया और यशोदा पुनः वात्सल्य में लौट आईं।

दामोदर लीला

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माखन चुराने पर माता यशोदा ने बालक कृष्ण को ऊखल से बाँधना चाहा। किंतु रस्सी सदैव दो अंगुल छोटी पड़ जाती — घर भर की रस्सियाँ जोड़ने पर भी। अंततः माता का श्रम और स्नेह देखकर भगवान स्वयं बँध गए। उदर में रस्सी बँधने के कारण उनका नाम "दामोदर" पड़ा।

कालिय मर्दन

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यमुना के कालिय ह्रद में विषधर नाग कालिय के कारण जल विषाक्त हो गया था। श्रीकृष्ण ने उस ह्रद में कूदकर कालिय से युद्ध किया और उसके फणों पर नृत्य किया। नागपत्नियों की प्रार्थना पर भगवान ने उसे प्राणदान दिया और रमणक द्वीप जाने का आदेश दिया।

गोवर्धन लीला

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श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को इंद्र-यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा का परामर्श दिया। अपमानित इंद्र ने प्रलयंकारी वर्षा की। तब भगवान ने गोवर्धन पर्वत को कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर सात दिनों तक व्रज की रक्षा की। अंततः इंद्र ने क्षमा माँगी और उन्हें "गोविंद" कहकर अभिषेक किया।

रास लीला

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शरद पूर्णिमा की रात्रि में श्रीकृष्ण की वंशी सुनकर गोपियाँ वृंदावन पहुँचीं। भगवान ने पहले उन्हें धर्म का स्मरण कराया, किंतु उनका प्रेम अडिग रहा। रास आरंभ हुआ; अभिमान उत्पन्न होने पर भगवान अंतर्धान हो गए। गोपियों की विरह-व्याकुलता और "गोपी गीत" के बाद वे पुनः प्रकट हुए और प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य किया।

कंस वध

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अक्रूर जी के निमंत्रण पर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पहुँचे। वहाँ उन्होंने धनुष-यज्ञ में शिव-धनुष तोड़ा, कुवलयापीड़ हाथी और चाणूर-मुष्टिक मल्लों का वध किया। अंततः श्रीकृष्ण ने मंच पर चढ़कर कंस का वध किया, देवकी-वसुदेव को बंधनमुक्त किया और उग्रसेन को पुनः राजा बनाया।

उद्धव संदेश

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मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा उद्धव को व्रज भेजा, जिससे वे गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश देकर उनका विरह शांत करें। किंतु व्रज पहुँचकर उद्धव ने पाया कि गोपियों का प्रेम उनके समस्त ज्ञान से ऊँचा है। वे स्वयं शिष्य बनकर लौटे।

रुक्मिणी हरण

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विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को मन से पति स्वीकार कर लिया था, किंतु उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से निश्चित कर दिया। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण द्वारा श्रीकृष्ण को पत्र भेजा। विवाह से पूर्व मंदिर से लौटते समय श्रीकृष्ण उन्हें रथ पर ले गए और द्वारका में विधिपूर्वक विवाह हुआ।

सुदामा चरित्र

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श्रीकृष्ण के बाल-सखा सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे। पत्नी के आग्रह पर वे थोड़े-से चावल भेंट लेकर द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने उन्हें सिंहासन पर बैठाकर सम्मान दिया और वे चावल प्रेमपूर्वक ग्रहण किए। सुदामा संकोचवश कुछ माँग न सके, किंतु लौटने पर उन्होंने अपनी कुटिया के स्थान पर भव्य भवन पाया।

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राधे राधे