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सुदामा चरित्र

Sudama Charitra

krishna leelaबच्चों के लिए

श्रीकृष्ण के बाल-सखा सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण थे। पत्नी के आग्रह पर वे थोड़े-से चावल भेंट लेकर द्वारका पहुँचे। श्रीकृष्ण ने उन्हें सिंहासन पर बैठाकर सम्मान दिया और वे चावल प्रेमपूर्वक ग्रहण किए। सुदामा संकोचवश कुछ माँग न सके, किंतु लौटने पर उन्होंने अपनी कुटिया के स्थान पर भव्य भवन पाया।

श्रीमद् भागवतम् · Canto 10, chapters 80–811 मिनट

कथा

सुदामा और श्रीकृष्ण सांदीपनि मुनि के आश्रम में सहपाठी थे। शिक्षा पूर्ण होने पर दोनों के मार्ग अलग हो गए — श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बने और सुदामा ब्राह्मण-वृत्ति में रहे। सुदामा संतोषी और स्वाध्यायशील थे, किंतु दरिद्रता ऐसी कि परिवार को भोजन भी कठिनाई से मिलता। उनकी पत्नी सुशीला ने अनेक बार कहा कि वे अपने मित्र द्वारकाधीश के पास जाएँ। सुदामा टालते रहे — मित्रता में याचना उन्हें उचित नहीं लगती थी। अंततः पत्नी के आग्रह पर वे चल पड़े। भेंट के लिए घर में कुछ न था, तो सुशीला ने पड़ोस से थोड़े-से चिउड़े (पोहा) माँगकर एक पोटली बाँध दी। द्वारका पहुँचकर उन्होंने वैभव देखा और संकोच से भर गए। किंतु जैसे ही श्रीकृष्ण को समाचार मिला, वे नंगे पाँव दौड़े और मित्र को हृदय से लगा लिया। उन्होंने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया, स्वयं उनके चरण धोए और उस जल को शीश पर धारण किया। रुक्मिणी ने चँवर डुलाया। बहुत देर तक दोनों मित्र बाल्यकाल की स्मृतियों में डूबे रहे। श्रीकृष्ण ने पूछा — "मित्र, मेरे लिए कुछ लाए हो?" सुदामा लज्जावश पोटली छिपाने लगे। भगवान ने बलपूर्वक वह पोटली ले ली और चिउड़े देखकर प्रसन्न होकर एक मुट्ठी खाई, फिर दूसरी। कहा जाता है कि रुक्मिणी ने तीसरी मुट्ठी रोक दी। सुदामा संकोच के कारण अपनी दरिद्रता का उल्लेख तक न कर सके और कुछ माँगे बिना ही लौट पड़े। मार्ग में वे सोचते रहे कि मित्र ने इतना सम्मान दिया, यही बहुत है। गाँव पहुँचकर उन्होंने देखा कि वहाँ उनकी टूटी कुटिया नहीं, भव्य भवन खड़ा है। एक क्षण को उन्हें लगा कि वे मार्ग भूल गए हैं। तभी सुशीला दिव्य वस्त्रों में बाहर आईं और उन्होंने समझ लिया कि यह किसकी कृपा है। वैभव पाकर भी सुदामा का जीवन पूर्ववत् सरल और भक्तिमय बना रहा।

सरल रूप

सुदामा श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र थे, पर बहुत ग़रीब थे। पत्नी के कहने पर वे थोड़े-से चिउड़े लेकर द्वारका गए। श्रीकृष्ण ने दौड़कर उनका स्वागत किया, सिंहासन पर बैठाया और चिउड़े प्रेम से खाए। सुदामा संकोच के कारण कुछ माँग न सके। लौटने पर उन्होंने अपनी कुटिया के स्थान पर सुंदर भवन पाया — यह भगवान की बिन माँगी कृपा थी।

बच्चों के लिए

सुदामा और कृष्ण बचपन में एक ही गुरुकुल में पढ़े थे और पक्के दोस्त थे। बड़े होकर कृष्ण द्वारका के राजा बन गए, पर सुदामा बहुत ग़रीब रहे। उनके घर में कई बार खाने को भी कुछ नहीं होता था। एक दिन उनकी पत्नी बोलीं, "आपके मित्र तो राजा हैं। उनसे मिलने जाइए।" सुदामा को संकोच हुआ, पर वे चल पड़े। भेंट में देने के लिए घर में कुछ नहीं था, तो पत्नी ने पड़ोस से थोड़े चिउड़े माँगकर एक छोटी-सी पोटली बाँध दी। द्वारका का बड़ा महल देखकर सुदामा घबरा गए। पर जैसे ही कृष्ण ने सुना कि सुदामा आए हैं, वे बिना जूते पहने दौड़ पड़े! उन्होंने अपने दोस्त को गले लगाया और अपने ही सिंहासन पर बैठा दिया। फिर कृष्ण ने पूछा, "मेरे लिए क्या लाए हो?" सुदामा शरमा गए और पोटली छिपाने लगे। पर कृष्ण ने हँसकर पोटली ले ली और चिउड़े मज़े से खाने लगे — जैसे दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चीज़ हो! सुदामा कुछ माँग ही नहीं पाए और घर लौट आए। पर वहाँ क्या देखते हैं — उनकी टूटी झोपड़ी की जगह एक सुंदर घर खड़ा था! सच्चा दोस्त बिना माँगे ही सब समझ गया था।

सार

सुदामा बिना कुछ माँगे लौटे, किंतु उनकी दरिद्रता सदा के लिए समाप्त हो गई। वैभव पाकर भी उनका जीवन सरल और भक्तिमय बना रहा, और उनकी मित्रता भक्ति का आदर्श बन गई।

शिक्षा

सच्ची मित्रता धन नहीं देखती। और सच्चा भक्त माँगता नहीं — भगवान बिना माँगे ही जान लेते हैं कि उसे क्या चाहिए।

महत्त्व

यह प्रसंग भारतीय परंपरा में मित्रता और भक्ति दोनों का आदर्श माना जाता है। "सुदामा के चावल" लोक-भाषा में निष्कपट भेंट का पर्याय बन चुके हैं। श्रीमद्भागवत में यह भगवान की उस कृपा का उदाहरण है जो माँगे बिना मिलती है।

पात्र

सुदामा

character

कृष्ण

avatar

The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.

रुक्मिणी

deity

The principal queen of Krishna at Dwarka, an aspect of Lakshmi.

मूल ग्रंथ

श्रीमद् भागवतम्