dialogue
उद्धव संदेश
Uddhava Sandesh
मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा उद्धव को व्रज भेजा, जिससे वे गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश देकर उनका विरह शांत करें। किंतु व्रज पहुँचकर उद्धव ने पाया कि गोपियों का प्रेम उनके समस्त ज्ञान से ऊँचा है। वे स्वयं शिष्य बनकर लौटे।
कथा
श्रीकृष्ण मथुरा चले गए, किंतु व्रज उनके बिना सूना रह गया। गोपियों, नंद, यशोदा और समस्त व्रजवासियों की विरह-दशा असह्य थी। श्रीकृष्ण ने अपने परम सखा और ज्ञानी भक्त उद्धव को बुलाया और कहा कि वे व्रज जाएँ और वहाँ के लोगों को सांत्वना दें। उद्धव ज्ञान और योग में निपुण थे; उन्हें विश्वास था कि वे उपदेश द्वारा गोपियों का विरह शांत कर देंगे। व्रज पहुँचकर उद्धव ने पहले नंद और यशोदा से भेंट की, फिर गोपियों को समझाया कि भगवान सर्वव्यापी हैं, निर्गुण हैं, वे कहीं नहीं गए — उन्हें ध्यान और योग द्वारा भीतर ही अनुभव किया जा सकता है। गोपियों ने उत्तर दिया कि उनका मन तो पहले ही श्रीकृष्ण के पास चला गया है, अब ध्यान वे किस मन से करें? जिसका हृदय ही चला गया हो, वह योग किससे साधे? तभी एक भ्रमर वहाँ आ पहुँचा। गोपियों ने उसे संबोधित करते हुए जो वचन कहे, वे "भ्रमर गीत" कहलाते हैं। उन्होंने भ्रमर के बहाने श्रीकृष्ण को उलाहना दिया — उनके चले जाने की, उनके वचन न निभाने की — और साथ ही यह भी स्वीकार किया कि उलाहना देकर भी वे उन्हीं को चाहती हैं। उद्धव यह देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने अनुभव किया कि जिस प्रेम की चर्चा शास्त्र करते हैं, वह इन ग्रामीण गोपियों में साक्षात् विद्यमान है — बिना शास्त्र पढ़े, बिना योग साधे। उद्धव ने कहा कि गोपियों के चरणों की धूलि वंदनीय है, और उन्होंने यह कामना की कि वे व्रज की किसी लता, वृक्ष अथवा तृण के रूप में जन्म लें, जिससे उन गोपियों की चरण-रज उन्हें प्राप्त हो। जो ज्ञान देने आया था, वह प्रेम सीखकर लौटा।
सरल रूप
श्रीकृष्ण ने उद्धव को व्रज भेजा कि वे गोपियों को ज्ञान और योग समझाकर उनका विरह शांत करें। उद्धव ने बहुत उपदेश दिया, किंतु गोपियों ने कहा कि उनका मन तो कृष्ण के पास है, वे ध्यान किससे करें। भ्रमर को देखकर उन्होंने जो कहा, वह भ्रमर गीत कहलाया। उद्धव समझ गए कि गोपियों का प्रेम ज्ञान से ऊँचा है और वे स्वयं शिष्य बनकर लौटे।
बच्चों के लिए
जब कृष्ण मथुरा चले गए, तो व्रज के सब लोग बहुत उदास हो गए। गोपियाँ हर दिन उनकी राह देखतीं। कृष्ण को यह पता था। उन्होंने अपने बहुत बुद्धिमान मित्र उद्धव से कहा, "तुम व्रज जाओ और सबको समझाओ कि उदास न हों।" उद्धव जी बहुत पढ़े-लिखे थे। उन्हें लगा, "मैं अच्छी-अच्छी बातें बताकर सबको समझा दूँगा।" व्रज पहुँचकर उन्होंने गोपियों से कहा, "भगवान तो हर जगह हैं। तुम ध्यान लगाओ, वे तुम्हारे मन में मिल जाएँगे।" गोपियाँ बोलीं, "पर उद्धव जी! हमारा मन तो कब का कृष्ण के पास चला गया। अब हम ध्यान किस मन से लगाएँ?" तभी एक भँवरा वहाँ उड़ता हुआ आया। गोपियों ने उसी से बातें करते हुए अपने मन की सारी बात कह दी। उद्धव जी सुनते रहे और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने सोचा — "मैं तो इन्हें सिखाने आया था, पर सच तो यह है कि प्यार करना मुझे इनसे सीखना चाहिए।" उन्होंने कहा, "काश! मैं व्रज की कोई छोटी-सी लता या घास बन जाऊँ, ताकि इन गोपियों के चरणों की धूल मुझे मिल सके।"
सार
उद्धव गोपियों के प्रेम के समक्ष नतमस्तक होकर मथुरा लौटे और उन्होंने श्रीकृष्ण के समक्ष उनकी महिमा का वर्णन किया। व्रज का विरह शांत तो न हुआ, किंतु वह विरह ही भक्ति का सर्वोच्च रूप बनकर प्रतिष्ठित हो गया।
शिक्षा
शास्त्र का ज्ञान बड़ा है, किंतु निष्कपट प्रेम उससे भी बड़ा। जो हृदय से जुड़ा है, उसे तर्क से समझाया नहीं जा सकता — और उसकी आवश्यकता भी नहीं।
महत्त्व
उद्धव संदेश तथा भ्रमर गीत हिंदी और ब्रज साहित्य की एक समृद्ध परंपरा का आधार बने — सूरदास के "भ्रमरगीत सार" से लेकर अनेक कवियों तक। यह प्रसंग वैष्णव दर्शन में विरह-भक्ति (विप्रलंभ शृंगार) का प्रमुख उदाहरण है।
पात्र
उद्धव
character
कृष्ण
avatar
The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.
राधा
deity
The eternal consort of Krishna and the embodiment of the highest devotion.
गोपियाँ
character

