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रास लीला

Rasa Leela

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शरद पूर्णिमा की रात्रि में श्रीकृष्ण की वंशी सुनकर गोपियाँ वृंदावन पहुँचीं। भगवान ने पहले उन्हें धर्म का स्मरण कराया, किंतु उनका प्रेम अडिग रहा। रास आरंभ हुआ; अभिमान उत्पन्न होने पर भगवान अंतर्धान हो गए। गोपियों की विरह-व्याकुलता और "गोपी गीत" के बाद वे पुनः प्रकट हुए और प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य किया।

श्रीमद् भागवतम् · Canto 10, chapters 29–331 मिनट

कथा

शरद ऋतु की पूर्णिमा थी। यमुना तट पर कुमुदिनी खिली थी और चंद्रमा की चाँदनी वृंदावन पर बरस रही थी। उस रात्रि श्रीकृष्ण ने अपनी वंशी बजाई। वंशी की ध्वनि सुनते ही व्रज की गोपियाँ सब कार्य छोड़कर चल पड़ीं — कोई दूध दुहते हुए, कोई भोजन बनाते हुए, कोई शृंगार अधूरा छोड़कर। उनके लिए उस क्षण कोई लौकिक बंधन शेष नहीं रहा। भगवान ने उन्हें देखकर पहले लौट जाने को कहा। उन्होंने कहा कि रात्रि है, वन भयावह है, और स्त्री का धर्म अपने कुल की सेवा है। किंतु गोपियों ने उत्तर दिया कि उन्होंने अपने सब सम्बंध भगवान के चरणों में अर्पित कर दिए हैं, और अब लौटने का कोई स्थान शेष नहीं। तब भगवान ने रास आरंभ किया। यमुना तट पर मंडल बना और नृत्य हुआ। किंतु उस आनंद के बीच गोपियों के मन में सूक्ष्म अभिमान उत्पन्न हुआ — कि भगवान उन्हीं के हैं। उसी क्षण श्रीकृष्ण अंतर्धान हो गए। गोपियाँ व्याकुल हो उठीं। उन्होंने वन-वन घूमकर वृक्षों, लताओं और मृगों से भगवान का पता पूछा। विरह की उसी अवस्था में उन्होंने जो स्तुति गाई, वह "गोपी गीत" कहलाती है — भक्ति साहित्य का एक शिखर। उनके अभिमान के क्षय और प्रेम के शुद्ध होने पर भगवान पुनः प्रकट हुए। तब रास पूर्ण हुआ, जिसमें भगवान ने स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट कर प्रत्येक गोपी के साथ नृत्य किया — और प्रत्येक ने अनुभव किया कि वे केवल उसी के साथ हैं। आचार्यों ने बारंबार कहा है कि यह लीला लौकिक काम से सर्वथा भिन्न है। श्रीमद्भागवत स्वयं इस प्रसंग के अंत में सावधान करता है कि यह प्रसंग अनुकरण का विषय नहीं, श्रवण का विषय है — और इसका फल काम का नाश है, न कि वृद्धि।

सरल रूप

शरद पूर्णिमा की रात श्रीकृष्ण ने वंशी बजाई और गोपियाँ सब कार्य छोड़कर वृंदावन पहुँच गईं। भगवान ने उन्हें लौटने को कहा, पर उनका प्रेम अडिग रहा। रास आरंभ हुआ, किंतु अभिमान आते ही भगवान अंतर्धान हो गए। गोपियों ने विरह में गोपी गीत गाया, और तब भगवान पुनः प्रकट होकर प्रत्येक के साथ नृत्य करने लगे।

बच्चों के लिए

शरद पूर्णिमा की एक बहुत सुंदर रात थी। आकाश में बड़ा-सा चाँद चमक रहा था और यमुना का पानी चाँदी जैसा लग रहा था। उस रात कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई। बाँसुरी की आवाज़ इतनी मीठी थी कि व्रज की सारी गोपियाँ अपना-अपना काम छोड़कर दौड़ पड़ीं। किसी के हाथ में दूध का बर्तन था, कोई खाना बना रही थी — पर सबको बस कृष्ण के पास पहुँचना था। फिर यमुना के किनारे एक बड़ा गोल घेरा बना और सब नाचने लगे। चाँद भी रुककर देखने लगा। पर बीच में कुछ गोपियों को लगा — "कृष्ण तो सिर्फ़ हमारे हैं।" जैसे ही यह घमंड आया, कृष्ण गायब हो गए! गोपियाँ बहुत उदास हुईं। वे पेड़ों से, फूलों से, हिरनों से पूछने लगीं — "हमारे कृष्ण कहाँ हैं?" और उन्होंने बहुत प्यारा गीत गाया। जब उनका घमंड चला गया और सिर्फ़ प्यार बचा, तब कृष्ण फिर आ गए। और अब कमाल हुआ — कृष्ण ने अपने कई रूप बना लिए, ताकि हर गोपी को लगे कि कृष्ण उसी के साथ नाच रहे हैं!

सार

गोपियों का अभिमान शुद्ध होकर प्रेम में परिणत हुआ और भगवान ने पुनः प्रकट होकर रास पूर्ण किया। यह लीला वृंदावन की भक्ति परंपरा का केंद्र बनी और शरद पूर्णिमा का उत्सव इसी से जुड़ा।

शिक्षा

प्रेम में जहाँ "मेरा" का अभिमान आता है, वहाँ भगवान दूर हो जाते हैं; और जहाँ केवल समर्पण शेष रहता है, वहाँ वे स्वयं प्रकट होते हैं।

महत्त्व

रास पंचाध्यायी (अध्याय 29–33) श्रीमद्भागवत का हृदय मानी जाती है और "गोपी गीत" भक्ति साहित्य का शिखर है। शरद पूर्णिमा का पर्व इसी लीला की स्मृति में मनाया जाता है। वैष्णव आचार्यों ने इसे माधुर्य भक्ति का परम आदर्श कहा है।

पात्र

कृष्ण

avatar

The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.

राधा

deity

The eternal consort of Krishna and the embodiment of the highest devotion.

गोपियाँ

character

मूल ग्रंथ

श्रीमद् भागवतम्