battle
कंस वध
Kansa Vadha
अक्रूर जी के निमंत्रण पर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पहुँचे। वहाँ उन्होंने धनुष-यज्ञ में शिव-धनुष तोड़ा, कुवलयापीड़ हाथी और चाणूर-मुष्टिक मल्लों का वध किया। अंततः श्रीकृष्ण ने मंच पर चढ़कर कंस का वध किया, देवकी-वसुदेव को बंधनमुक्त किया और उग्रसेन को पुनः राजा बनाया।
कथा
कंस ने श्रीकृष्ण और बलराम को मारने की योजना बनाकर धनुष-यज्ञ के बहाने उन्हें मथुरा बुलाया। अक्रूर जी रथ लेकर वृंदावन आए और दोनों भाइयों को मथुरा ले चले। व्रजवासियों के लिए यह वियोग का क्षण था। मथुरा पहुँचकर दोनों भाइयों ने नगर देखा। मार्ग में एक धोबी ने अभद्रता की तो उसका दंड मिला; कुब्जा नामक कुबड़ी दासी ने श्रद्धा से चंदन अर्पित किया और भगवान ने उसे सीधा और सुंदर कर दिया — यह उनके स्वभाव का परिचय था कि वे भाव देखते हैं, रूप नहीं। यज्ञशाला में रखा विशाल शिव-धनुष श्रीकृष्ण ने सहज ही उठाकर तोड़ दिया। यह कंस के लिए पहला संकेत था। अगले दिन रंगभूमि में मल्लयुद्ध का आयोजन हुआ। प्रवेश द्वार पर कंस ने कुवलयापीड़ नामक मदमस्त हाथी खड़ा किया था। उसने आक्रमण किया तो श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया और उसका दाँत लेकर सभा में प्रवेश किया। तत्पश्चात चाणूर और मुष्टिक जैसे विख्यात मल्ल सामने आए। सभा में उपस्थित नागरिकों ने विरोध किया कि बालकों का बलवान मल्लों से युद्ध अन्याय है, किंतु युद्ध हुआ — और श्रीकृष्ण ने चाणूर का तथा बलराम ने मुष्टिक का वध किया। यह देखकर कंस क्रोध से भर उठा और उसने गोप-गोपियों तथा वसुदेव-देवकी के वध का आदेश दे डाला। उसी क्षण श्रीकृष्ण एक छलाँग में मंच पर जा पहुँचे, कंस का मुकुट गिरा, केश पकड़कर उसे मंच से नीचे खींचा और उसका वध कर दिया। तत्पश्चात भगवान ने कारागार जाकर देवकी और वसुदेव के बंधन काटे और उनके चरणों में प्रणाम किया। उन्होंने कंस के वृद्ध पिता उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा बनाया और कंस की पत्नियों तथा परिजनों को सांत्वना दी।
सरल रूप
कंस ने धनुष-यज्ञ के बहाने श्रीकृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। वहाँ उन्होंने शिव-धनुष तोड़ा, कुवलयापीड़ हाथी को मारा और चाणूर-मुष्टिक मल्लों का वध किया। फिर श्रीकृष्ण ने मंच पर चढ़कर कंस का वध किया। उन्होंने देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त किया और उग्रसेन को फिर से राजा बनाया।
बच्चों के लिए
दुष्ट राजा कंस बहुत डरता था, क्योंकि उसे पता था कि कृष्ण उसका अंत करेंगे। उसने एक चाल चली — उसने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। अक्रूर जी रथ लेकर आए और दोनों भाई मथुरा पहुँचे। रास्ते में कुब्जा नाम की एक स्त्री मिली, जिसकी पीठ झुकी हुई थी। उसने प्यार से कृष्ण को चंदन दिया। कृष्ण ने उसे छूकर सीधा कर दिया — वह बहुत सुंदर हो गई! मथुरा में एक बहुत भारी धनुष रखा था, जिसे कोई उठा नहीं सकता था। कृष्ण ने उसे खेल-खेल में उठाकर तोड़ दिया। फिर कंस ने एक पागल हाथी भेजा। कृष्ण ने उसे भी हरा दिया। फिर दो बहुत ताक़तवर पहलवान आए — चाणूर और मुष्टिक। लोग बोले, "ये तो बच्चों से लड़ रहे हैं, यह ग़लत है!" पर कृष्ण और बलराम ने दोनों को हरा दिया। अब कंस बहुत गुस्सा हो गया। तभी कृष्ण एक छलाँग में उसके मंच पर पहुँच गए और उसका अंत कर दिया। फिर कृष्ण जेल गए, जहाँ उनके असली माता-पिता देवकी और वसुदेव बंद थे। उन्होंने उनकी ज़ंजीरें तोड़ीं और उनके पैर छुए। सारी मथुरा खुशी से झूम उठी!
सार
कंस का अंत हुआ, देवकी और वसुदेव बंधनमुक्त हुए, और उग्रसेन पुनः मथुरा के राजा बने। श्रीकृष्ण की व्रज-लीला यहीं पूर्ण हुई और मथुरा में उनका नया जीवन आरंभ हुआ।
शिक्षा
अन्याय पर टिकी सत्ता कितनी भी बलवान दिखे, स्थायी नहीं होती। भय से शासन करने वाला अंततः अपने ही भय से नष्ट होता है।
महत्त्व
कंस वध श्रीकृष्ण की व्रज-लीला का समापन और मथुरा-लीला का आरंभ है। यहीं से उनके राजनीतिक और धर्म-स्थापना संबंधी कार्यों का क्रम प्रारंभ होता है। यह प्रसंग "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्" के सिद्धांत का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जाता है।
पात्र
कृष्ण
avatar
The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.
कंस
character
बलराम
avatar
The elder brother of Krishna, the ploughman, an expansion of Ananta Shesha.
देवकी
deity
The mother of Krishna, imprisoned by Kamsa at Mathura.
वसुदेव
deity
The father of Krishna, who carried him across the Yamuna.

