leela
दामोदर लीला
Damodar Leela
माखन चुराने पर माता यशोदा ने बालक कृष्ण को ऊखल से बाँधना चाहा। किंतु रस्सी सदैव दो अंगुल छोटी पड़ जाती — घर भर की रस्सियाँ जोड़ने पर भी। अंततः माता का श्रम और स्नेह देखकर भगवान स्वयं बँध गए। उदर में रस्सी बँधने के कारण उनका नाम "दामोदर" पड़ा।
कथा
एक प्रातः माता यशोदा दही मथ रही थीं। उसी समय बालक कृष्ण आए और दूध पीने का हठ करने लगे। यशोदा ने उन्हें गोद में लेकर दूध पिलाना आरंभ किया, किंतु तभी चूल्हे पर रखा दूध उफनने लगा। माता कृष्ण को नीचे बैठाकर दूध सँभालने चली गईं। रुष्ट होकर कृष्ण ने पास रखी दही की मटकी फोड़ दी और माखन लेकर एक ओर जा बैठे तथा बंदरों को बाँटने लगे। लौटकर यशोदा ने फूटी मटकी और बिखरा माखन देखा। वे छड़ी लेकर कृष्ण के पीछे दौड़ीं। भगवान आगे-आगे दौड़े और माता पीछे। शास्त्र कहते हैं — जिन्हें योगी अपने ध्यान में नहीं पकड़ पाते, उन्हें उस दिन वात्सल्य ने पकड़ लिया। थककर श्रीकृष्ण रुक गए और माता ने उन्हें पकड़ लिया। यशोदा ने निश्चय किया कि इस चंचल बालक को ऊखल से बाँध देंगी। उन्होंने रस्सी लाकर बाँधनी चाही — किंतु रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ गई। उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ी, फिर भी दो अंगुल कम। घर भर की रस्सियाँ जोड़ दी गईं, पर हर बार वही दो अंगुल की कमी बनी रही। यशोदा का शरीर पसीने से भीग गया, केश बिखर गए, किंतु उन्होंने हार नहीं मानी। तब भगवान ने माता का यह श्रम और अटूट स्नेह देखा और स्वयं बँध जाना स्वीकार कर लिया। आचार्य कहते हैं कि वे दो अंगुल कभी भी रस्सी की कमी नहीं थे — वे भक्त के प्रयास और भगवान की कृपा के बीच का अंतर हैं। जब तक साधक अपने पुरुषार्थ पर निर्भर रहता है, कमी बनी रहती है; जब भगवान स्वयं झुक जाते हैं, तभी बंधन पूर्ण होता है। उदर (दाम) में रस्सी (उदर) बँधने से उनका नाम "दामोदर" प्रसिद्ध हुआ।
सरल रूप
कृष्ण ने दही की मटकी फोड़ दी और माखन बंदरों को बाँट दिया। यशोदा माता उन्हें पकड़कर ऊखल से बाँधने लगीं, किंतु रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पड़ जाती। घर की सारी रस्सियाँ जोड़ने पर भी वही कमी रही। अंत में माता का परिश्रम और प्रेम देखकर भगवान स्वयं बँध गए। इसी कारण उनका नाम दामोदर पड़ा।
बच्चों के लिए
एक दिन माँ यशोदा दही मथ रही थीं। नन्हे कृष्ण को भूख लगी, पर तभी चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा और माँ उसे सँभालने चली गईं। कृष्ण को गुस्सा आ गया! उन्होंने दही की मटकी फोड़ दी और माखन उठाकर बंदरों को खिलाने लगे। माँ लौटीं तो सब देखकर हैरान रह गईं। वे छड़ी लेकर कृष्ण के पीछे दौड़ीं — और कृष्ण हँसते हुए आगे-आगे भागे! आख़िर माँ ने उन्हें पकड़ ही लिया। माँ बोलीं, "अब तुम्हें ऊखल से बाँधती हूँ!" उन्होंने रस्सी लाकर बाँधनी चाही — पर रस्सी दो उँगली छोटी पड़ गई। माँ ने दूसरी रस्सी जोड़ी — फिर भी दो उँगली कम! तीसरी, चौथी... घर की सारी रस्सियाँ जोड़ दीं, पर हर बार दो उँगली की कमी रह जाती। माँ थक गईं, पसीना आ गया, फिर भी उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी। तब कृष्ण मुस्कुराए और सोचा — "माँ का प्यार जीत गया।" और वे खुद बँध गए! पेट पर रस्सी बँधने के कारण उनका एक प्यारा नाम पड़ा — दामोदर।
सार
श्रीकृष्ण ऊखल से बँध गए और उनका नाम दामोदर प्रसिद्ध हुआ। बँधे रहते हुए भी उन्होंने आगे यमलार्जुन उद्धार की लीला की। माता यशोदा का वात्सल्य इस प्रसंग के बाद और भी प्रगाढ़ हो गया।
शिक्षा
भगवान बल से नहीं, प्रेम और अटूट प्रयास से बँधते हैं। माता यशोदा की रस्सी छोटी थी, किंतु उनका स्नेह असीम — और भगवान ने उसी स्नेह के आगे स्वयं को बाँध लेने दिया।
महत्त्व
दामोदर लीला वैष्णव परंपरा की सर्वाधिक प्रिय बाल-लीलाओं में है और कार्तिक मास में "दामोदराष्टक" के पाठ का आधार है। यह प्रसंग वात्सल्य भक्ति का शिखर माना जाता है — यहाँ परमेश्वर स्वयं को एक माता के हाथों बँधने देते हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी महिमा कही गई है।
पात्र
कृष्ण
avatar
The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.
यशोदा
deity
The foster-mother of Krishna at Gokul.

