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विद्या

  • 103 श्लोक
1.44अर्जुन

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।1.44।।

utsanna-kula-dharmāṇāṁ manuṣhyāṇāṁ janārdana narake ‘niyataṁ vāso bhavatītyanuśhuśhruma

।।1.44।। हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वापस होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
2.16श्रीकृष्ण

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।2.16।।

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ

।।2.16।। (टिप्पणी प0 55) असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है।

2.28श्रीकृष्ण

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।

avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā

।।2.28।। हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?

2.45श्रीकृष्ण

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।

trai-guṇya-viṣhayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna nirdvandvo nitya-sattva-stho niryoga-kṣhema ātmavān

।।2.45।। वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, निर्द्वन्द्व हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा।

2.46श्रीकृष्ण

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।2.46।।

yāvān artha udapāne sarvataḥ samplutodake tāvānsarveṣhu vedeṣhu brāhmaṇasya vijānataḥ

।।2.46।। सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, वेदों और शास्त्रोंको तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
2.59श्रीकृष्ण

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।2.59।।

viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

।।2.59।। निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

3.28श्रीकृष्ण

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।3.28।।

tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ guṇā guṇeṣhu vartanta iti matvā na sajjate

।।3.28।।  हे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' --  ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।

कर्ममनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
3.29श्रीकृष्ण

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।3.29।।

prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu tān akṛitsna-vido mandān kṛitsna-vin na vichālayet

।।3.29।। प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।

ज्ञानमनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
4.2श्रीकृष्ण

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।4.2।।

evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa

।।4.2।। हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया।

4.5श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।4.5।।

śhrī bhagavān uvācha bahūni me vyatītāni janmāni tava chārjuna tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa

।।4.5।। श्रीभगवान् बोले -- हे परन्तप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता।

4.9श्रीकृष्ण

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।4.9।।

janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna

।।4.9।। हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

कर्मज्ञानजीवनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
4.15श्रीकृष्ण

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।।4.15।।

evaṁ jñātvā kṛitaṁ karma pūrvair api mumukṣhubhiḥ kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛitam

।।4.15।। पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर।

कर्मज्ञानक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
4.17श्रीकृष्ण

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।4.17।।

karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ cha vikarmaṇaḥ akarmaṇaśh cha boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ

।।4.17।। कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है।

कर्मधर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
4.20श्रीकृष्ण

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ

।।4.20।। जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

कर्मवैराग्यक्रियाविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
4.30श्रीकृष्ण

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः।।4.30।।

apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ

।।4.29 -- 4.30।। दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

4.34श्रीकृष्ण

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।

tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ

।।4.34।। उस- (तत्त्वज्ञान-) को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे।

4.35श्रीकृष्ण

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।4.35।।

yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi

।।4.35।। जिस- (तत्त्वज्ञान-) का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन ! जिस- (तत्त्वज्ञान-) से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा।

4.42श्रीकृष्ण

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।

tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

।।4.42।। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग -(समता-) में स्थित हो जा, (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।

ज्ञानयोगजीवनविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
5.3श्रीकृष्ण

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5.3।।

jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate

।।5.3।। हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

5.5श्रीकृष्ण

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।

yat sānkhyaiḥ prāpyate sthānaṁ tad yogair api gamyate ekaṁ sānkhyaṁ cha yogaṁ cha yaḥ paśhyati sa paśhyati

।।5.5।। सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है।

कर्मज्ञानयोगक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
5.8श्रीकृष्ण

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन्।।5.8।।

naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit paśhyañ śhṛiṇvan spṛiśhañjighrann aśhnangachchhan svapañśhvasan pralapan visṛijan gṛihṇann unmiṣhan nimiṣhann api indriyāṇīndriyārtheṣhu vartanta iti dhārayan

।।5.8 -- 5.9।। तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
5.15श्रीकृष्ण

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।5.15।।

nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ

।।5.15।। सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।

5.16श्रीकृष्ण

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।।5.16।।

jñānena tu tad ajñānaṁ yeṣhāṁ nāśhitam ātmanaḥ teṣhām āditya-vaj jñānaṁ prakāśhayati tat param

।।5.16।। परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान-(विवक-) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है।

5.19श्रीकृष्ण

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।5.19।।

ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣhāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ nirdoṣhaṁ hi samaṁ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ

।।5.19।। जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।

कर्ममनजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
5.20श्रीकृष्ण

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।5.20।।

na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ

।।5.20।। जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

6.2श्रीकृष्ण

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।6.2।।

yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava na hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana

।।6.2।। हे अर्जुन ! लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता।

कर्मयोगमनवैराग्यक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
6.21श्रीकृष्ण

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।।6.21।।

sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ

।।6.21।। जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता।

6.23श्रीकृष्ण

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।6.23।।

taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā

।।6.23।। जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।

योगमनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
6.32श्रीकृष्ण

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।6.32।।

ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ

।।6.32।। हे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।

7.2श्रीकृष्ण

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।7.2।।

jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam-avaśhiṣhyate

।।7.2।। तेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा।

ज्ञानजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
7.3श्रीकृष्ण

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्िचद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्िचन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।7.3।।

manuṣhyāṇāṁ sahasreṣhu kaśhchid yatati siddhaye yatatām api siddhānāṁ kaśhchin māṁ vetti tattvataḥ

।।7.3।। हजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।

7.16श्रीकृष्ण

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।7.16।।

chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjuna ārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha

।।7.16।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

भक्तिज्ञानधर्मविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.2अर्जुन

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।8.2।।

adhiyajñaḥ kathaṁ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana prayāṇa-kāle cha kathaṁ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ

।।8.1 -- 8.2।। अर्जुन बोले -- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदैव किसको कहा जाता है? यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है? हे मधूसूदन ! नियतात्मा (वशीभूत अन्तःकरणवाले) मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं?

ज्ञानमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.9श्रीकृष्ण

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।

kaviṁ purāṇam anuśhāsitāram aṇor aṇīyānsam anusmared yaḥ sarvasya dhātāram achintya-rūpam āditya-varṇaṁ tamasaḥ parastāt

।।8.9।। जो सर्वज्ञ, पुराण, शासन करनेवाला, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाला, अज्ञानसे अत्यन्त परे, सूर्यकी तरह प्रकाशस्वरूप -- ऐसे अचिन्त्य स्वरूपका चिन्तन करता है।

नेतृत्वध्यानविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.18श्रीकृष्ण

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।।8.18।।

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgame rātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake

।।8.18।। ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तमें सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं।

8.20श्रीकृष्ण

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति।।8.20।।

paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ yaḥ sa sarveṣhu bhūteṣhu naśhyatsu na vinaśhyati

।।8.20।। परन्तु उस अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से अन्य अनादि सर्वश्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त है, उसका सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नाश नहीं होता।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.21श्रीकृष्ण

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।8.21।।

avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama

।।8.21।। उसीको अव्यक्त और अक्षर कहा गया है और उसीको परमगति कहा गया है तथा जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
8.28श्रीकृष्ण

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।8.28।।

vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam atyeti tat sarvam idaṁ viditvā yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam

।।8.28।। योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

योगक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
9.1श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।9.1।।

śhrī bhagavān uvācha idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

।।9.1।। श्रीभगवान् बोले -- यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभसे अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जायगा।

9.5श्रीकृष्ण

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।

na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ

।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

9.17श्रीकृष्ण

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च।।9.17।।

pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha

।।9.16 -- 9.18।। क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

कर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
9.20श्रीकृष्ण

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।9.20।।

trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante te puṇyam āsādya surendra-lokam aśhnanti divyān divi deva-bhogān

।।9.20।। वेदत्रयीमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानको करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले जो पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा इन्द्ररूपसे मेरा पूजन करके स्वर्ग-प्राप्तिकी प्रार्थना करते हैं, वे पुण्यके फलस्वरूप इन्द्रलोकको प्राप्त करके वहाँ स्वर्गमें देवताओंके दिव्य भोगोंको भोगते हैं।

9.24श्रीकृष्ण

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।9.24।।

ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te

।।9.24।। क्योंकि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हूँ;  परन्तु वे मेरेको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे उनका पतन होता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
10.4श्रीकृष्ण

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।10.4।।

buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha

।।10.4 -- 10.5।। बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।

ज्ञानभयमनशांतिजीवनमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
10.11श्रीकृष्ण

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।10.11।।

teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā

।।10.11।। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।

ज्ञानजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
10.38श्रीकृष्ण

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।10.38।।

daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣhatām maunaṁ chaivāsmi guhyānāṁ jñānaṁ jñānavatām aham

।।10.38।। दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ। गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ।

ज्ञाननेतृत्वविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
11.18अर्जुन

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।11.18।।

tvam akṣharaṁ paramaṁ veditavyaṁ tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam tvam avyayaḥ śhāśhvata-dharma-goptā sanātanas tvaṁ puruṣho mato me

।।11.18।। आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।

धर्मजीवनमृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
11.38अर्जुन

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।11.38।।

tvam ādi-devaḥ puruṣhaḥ purāṇas tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam vettāsi vedyaṁ cha paraṁ cha dhāma tvayā tataṁ viśhvam ananta-rūpa

।।11.38।। आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं। आप ही सबको जाननेवाले, जाननेयोग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।

ज्ञानविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
11.54श्रीकृष्ण

भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप।।11.54।।

bhaktyā tv ananyayā śhakya aham evaṁ-vidho ’rjuna jñātuṁ draṣhṭuṁ cha tattvena praveṣhṭuṁ cha parantapa

।।11.54।। परन्तु हे शत्रुतापन अर्जुन ! इस प्रकार (चतुर्भुजरूपवाला) मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें, सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ।

भक्तिमनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.1अर्जुन

अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।13.1।।

arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava

।।13.1।। No Translation

13.2श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।13.2।।

śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

।।13.2।।श्रीभगवान् बोले -- हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! 'यह' -- रूपसे कहे जानेवाले शरीरको 'क्षेत्र' कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग 'क्षेत्रज्ञ' नामसे कहते हैं।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.3श्रीकृष्ण

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।13.3।।

kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama

।।13.3।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको ही समझ; और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतमें ज्ञान है।

13.12श्रीकृष्ण

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।13.12।।

adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā

।।13.12।।अध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है।

13.13श्रीकृष्ण

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।13.13।।

jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate

।।13.13।। जो ज्ञेय है, उस-(परमात्मतत्त्व-) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.17श्रीकृष्ण

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।13.17।।

avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha

।।13.17।।वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित हैं। वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, उनका भरण-पोषण करनेवाले और संहार करनेवाले हैं।

13.27श्रीकृष्ण

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।13.27।।

yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha

।।13.27।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो।

योगजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.30श्रीकृष्ण

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति।।13.30।।

prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati

।।13.30।।जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने-आपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है।

कर्मधर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
13.35श्रीकृष्ण

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।13.35।।

kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param

।।13.35।।इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तर-(विभाग-) को तथा कार्य-कारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

ज्ञानधर्मजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.1श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।14.1।।

śhrī-bhagavān uvācha paraṁ bhūyaḥ pravakṣhyāmi jñānānāṁ jñānam uttamam yaj jñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhim ito gatāḥ

।।14.1।।श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं।

ज्ञानजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.5श्रीकृष्ण

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।14.5।।

sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam

।।14.5।।हे महाबाहो ! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं।

धर्मजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.8श्रीकृष्ण

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।14.8।।

tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata

।।14.8।।हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा देहधारियोंको बाँधता है।

मनजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.9श्रीकृष्ण

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।14.9।।

sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta

।।14.9।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! सत्त्वगुण सुखमें और रजोगुण कर्ममें लगाकर मनुष्यपर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञानको ढककर एवं प्रमादमें भी लगाकर मनुष्यपर विजंय करता है।

कर्मज्ञानजीवनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.10श्रीकृष्ण

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।14.10।।

rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata rajaḥ sattvaṁ tamaśh chaiva tamaḥ sattvaṁ rajas tathā

।।14.10।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण सत्त्वगुण, और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

14.11श्रीकृष्ण

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।14.11।।

sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta

।।14.11।।जब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों-(इन्द्रियों और अन्तःकरण-) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

14.13श्रीकृष्ण

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।14.13।।

aprakāśho ’pravṛittiśh cha pramādo moha eva cha tamasy etāni jāyante vivṛiddhe kuru-nandana

।।14.13।।हे कुरुनन्दन ! तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह -- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

14.14श्रीकृष्ण

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।14.14।।

yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit tadottama-vidāṁ lokān amalān pratipadyate

।।14.14।।जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.15श्रीकृष्ण

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।14.15।।

rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣhu jāyate tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣhu jāyate

।।14.15।।रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है।

कर्ममनजीवनमृत्युक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.16श्रीकृष्ण

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।14.16।।

karmaṇaḥ sukṛitasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam rajasas tu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam

।।14.16।।(विवेकी पुरुषोंने) शुभ-कर्मका तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्मका फल दुःख कहा है और तामस कर्मका फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

कर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
14.17श्रीकृष्ण

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।14.17।।

sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha

।।14.17।।सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।

14.18श्रीकृष्ण

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।14.18।।

ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ

।।14.18।।सत्त्वगुणमें स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, रजोगुणमें स्थित मनुष्य मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित मनुष्य अधोगतिमें जाते हैं।

15.1श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

śhrī-bhagavān uvācha ūrdhva-mūlam adhaḥ-śhākham aśhvatthaṁ prāhur avyayam chhandānsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit

।।15.1।। श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।

15.3श्रीकृष्ण

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।15.3।।

na rūpam asyeha tathopalabhyate nānto na chādir na cha sampratiṣhṭhā aśhvattham enaṁ su-virūḍha-mūlam asaṅga-śhastreṇa dṛiḍhena chhittvā

।।15.3।।इस संसारवृक्षका जैसा रूप देखनेमें आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं; क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है। इसलिये इस दृढ़ मूलोंवाले संसाररूप अश्वत्थवृक्षको दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्रके द्वारा काटकर --

वैराग्यविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
15.5श्रीकृष्ण

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।।

nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣhā adhyātma-nityā vinivṛitta-kāmāḥ dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sanjñair gachchhanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat

।।15.5।।जो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःखरूप द्वन्द्वोंसे मुक्त हो गये हैं, ऐसे (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद-(परमात्मा-) को प्राप्त होते हैं।

वैराग्यविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
15.15श्रीकृष्ण

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।

sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo mattaḥ smṛitir jñānam apohanaṁ cha vedaiśh cha sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛid veda-vid eva chāham

।।15.15।।मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ। मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ। वेदोंके तत्त्वका निर्णय करनेवाला और वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ।

कर्मज्ञानविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
15.18श्रीकृष्ण

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।15.18।।

yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ ato ’smi loke vede cha prathitaḥ puruṣhottamaḥ

।।15.18।।मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ।

मृत्युविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
15.19श्रीकृष्ण

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।।15.19।।

yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣhottamam sa sarva-vid bhajati māṁ sarva-bhāvena bhārata

।।15.19।।हे भरतवंशी अर्जुन ! इस प्रकार जो मोहरहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है।

भक्तिसमर्पणविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
16.2श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

।।16.2।।अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

16.4श्रीकृष्ण

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।

dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

।।16.4।।हे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

16.7श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।16.7।।

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ na śhauchaṁ nāpi chāchāro na satyaṁ teṣhu vidyate

।।16.7।।आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।

वैराग्यक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
16.8श्रीकृष्ण

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam

।।16.8।।वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है।

योगजीवनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
16.15श्रीकृष्ण

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau

।।16.15।।हम धनवान् हैं, बहुत-से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है? हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।

जीवनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
16.24श्रीकृष्ण

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau jñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi

।।16.24।।अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है -- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्र-विधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है।

जीवनक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.1अर्जुन

अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।17.1।।

arjuna uvācha ye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥ teṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ

।।17.1।। अर्जुन बोले -- हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी?

समर्पणक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.2श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।।17.2।।

śhrī-bhagavān uvācha tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu

।।17.2।।श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो।

समर्पणविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.13श्रीकृष्ण

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।17.13।।

vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇam śhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate

।।17.13।।शास्त्रविधिसे हीन, अन्न-दानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं।

समर्पणविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.15श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।17.15।।

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

।।17.15।।उद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.19श्रीकृष्ण

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।17.19।।

mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛitam

।।17.19।।जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे अपनेको पीड़ा देकर अथवा दूसरोंको कष्ट देनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
17.22श्रीकृष्ण

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।17.22।।

adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam

।।17.22।।जो दान बिना सत्कारके तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और कालमें कुपात्रको दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

17.26श्रीकृष्ण

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।17.26।।

sad-bhāve sādhu-bhāve cha sad ity etat prayujyate praśhaste karmaṇi tathā sach-chhabdaḥ pārtha yujyate

।।17.26।।हे पार्थ ! परमात्माके 'सत्'--इस  नामका सत्तामात्रमें और श्रेष्ठ भावमें प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्मके साथ 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है।

कर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.1अर्जुन

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।18.1।।

arjuna uvācha sannyāsasya mahā-bāho tattvam ichchhāmi veditum tyāgasya cha hṛiṣhīkeśha pṛithak keśhi-niṣhūdana

।।18.1।। अर्जुन बोले -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं  संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

18.4श्रीकृष्ण

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः।।18.4।।

niśhchayaṁ śhṛiṇu me tatra tyāge bharata-sattama tyāgo hi puruṣha-vyāghra tri-vidhaḥ samprakīrtitaḥ

।।18.4।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।

18.7श्रीकृष्ण

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।18.7।।

niyatasya tu sannyāsaḥ karmaṇo nopapadyate mohāt tasya parityāgas tāmasaḥ parikīrtitaḥ

।।18.7।।नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।

कर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.16श्रीकृष्ण

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।18.16।।

tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ paśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ

।।18.16।।परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।

क्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.18श्रीकृष्ण

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।।18.18।।

jñānaṁ jñeyaṁ parijñātā tri-vidhā karma-chodanā karaṇaṁ karma karteti tri-vidhaḥ karma-saṅgrahaḥ

।।18.18।।ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनोंसे कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनोंसे कर्मसंग्रह होता है।

कर्मज्ञानक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.20श्रीकृष्ण

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।18.20।।

sarva-bhūteṣhu yenaikaṁ bhāvam avyayam īkṣhate avibhaktaṁ vibhakteṣhu taj jñānaṁ viddhi sāttvikam

।।18.20।।जिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।

18.22श्रीकृष्ण

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।18.22।।

yat tu kṛitsna-vad ekasmin kārye saktam ahaitukam atattvārtha-vad alpaṁ cha tat tāmasam udāhṛitam

।।18.22।।किंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।

18.25श्रीकृष्ण

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।18.25।।

anubandhaṁ kṣhayaṁ hinsām anapekṣhya cha pauruṣham mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam uchyate

।।18.25।।जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

कर्मक्रियाविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.32श्रीकृष्ण

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।18.32।।

adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā sarvārthān viparītānśh cha buddhiḥ sā pārtha tāmasī

।।18.32।।हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।

धर्ममनविद्याशब्दार्थ एवं भाष्य
18.35श्रीकृष्ण

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।18.35।।

yayā svapnaṁ bhayaṁ śhokaṁ viṣhādaṁ madam eva cha na vimuñchati durmedhā dhṛitiḥ sā pārtha tāmasī

।।18.35।।हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।

18.39श्रीकृष्ण

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।18.39।।

yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam

।।18.39।।निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।