वृंदावन TV
मेरो वृंदावन
राजविद्याराजगुह्ययोग
9.5श्रीकृष्ण

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।

na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ

।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

योगविद्या

शब्दार्थ

na

never

cha

and

mat-sthāni

abide in me

bhūtāni

all living beings

paśhya

behold

me

my

yogam aiśhwaram

divine energy

bhūta-bhṛit

the sustainer of all living beings

na

never

cha

yet

bhūta-sthaḥ

dwelling in

mama

my

ātmā

self

bhūta-bhāvanaḥ

the creator of all beings

अनुवाद

Nor do beings exist in Me (in reality); behold, My divine Yoga, which supports all beings, but does not dwell in them, is My Self, the efficient cause of beings.

Swami Sivananda · meaning

Nevertheless, they do not consciously abide in Me. Such is My Divine Sovereignty that, though I, the Supreme Self, am the cause and upholder of all, yet I remain outside.

Shri Purohit Swami · simple

।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।9.5।। और (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।9.5।। -- न च मत्स्थानि भूतानि ब्रह्मादीनि। पश्य मे योगं युक्तिं घटनं मे मम ऐश्वरम् ईश्वरस्य इमम् ऐश्वरम्? योगम् आत्मनो याथात्म्यमित्यर्थः। तथा च श्रुतिः असंसर्गित्वात् असङ्गतां दर्शयति -- असङ्गो न हि सज्जते (बृह0 उ0 3।9।26) इति। इदं च आश्चर्यम् अन्यत् पश्य -- भूतभृत् असङ्गोऽपि सन् भूतानि बिभर्ति न च भूतस्थः? यथोक्तेन न्यायेन दर्शितत्वात् भूतस्थत्वानुपपत्तेः। कथं पुनरुच्यते असौ मम आत्मा इति विभज्य देहादिसङ्घातं तस्मिन् अहंकारम् अध्यारोप्य लोकबुद्धिम् अनुसरन् व्यपदिशति मम आत्मा इति? न पुनः आत्मनः आत्मा अन्यः इति लोकवत् अजानन्। तथा भूतभावनः भूतानि भावयति उत्पादयति वर्धयतीति वा भूतभावनः।।यथोक्तेन श्लोकद्वयेन उक्तम् अर्थं दृष्टान्तेन उपपादयन् आह --,

मुख्य शब्द

yogareality