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विभूतियोग
10.11श्रीकृष्ण

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।10.11।।

teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā

।।10.11।। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।

ज्ञानजीवनविद्या

शब्दार्थ

teṣhām

for them

eva

only

anukampā-artham

out of compassion

aham

I

ajñāna-jam

born of ignorance

tamaḥ

darkness

nāśhayāmi

destroy

ātma-bhāva

within their hearts

sthaḥ

dwelling

jñāna

of knowledge

dīpena

with the lamp

bhāsvatā

luminous

अनुवाद

Out of mere compassion for them, I, dwelling within their selves, destroy the darkness born of ignorance with the luminous lamp of knowledge.

— Swami Sivananda · meaning

By My grace, I live in their hearts, and I dispel the darkness of ignorance with the shining light of wisdom.

— Shri Purohit Swami · simple

।।10.11।। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।

— Swami Ramsukhdas · meaning

।।10.11।। उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्त:करण में स्थित होकर, अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।।

— Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।10.11।। --,तेषामेव कथं नु नाम श्रेयः स्यात् इति अनुकम्पार्थं दयाहेतोः अहम् अज्ञानजम् अविवेकतः जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं मोहान्धकारं तमः नाशयामि? आत्मभावस्थः आत्मनः भावः अन्तःकरणाशयः तस्मिन्नेव स्थितः सन् ज्ञानदीपेन विवेकप्रत्ययरूपेण भक्तिप्रसादस्नेहाभिषिक्तेन मद्भावनाभिनिवेशवातेरितेन ब्रह्मचर्यादिसाधनसंस्कारवत्प्रज्ञावर्तिना विरक्तान्तःकरणाधारेण विषयव्यावृत्तचित्तरागद्वेषाकलुषितनिवातापवरकस्थेन नित्यप्रवृत्तैकाग्र्यध्यानजनितसम्यग्दर्शनभास्वता ज्ञानदीपेनेत्यर्थः।।यथोक्तां भगवतः विभूतिं योगं च श्रुत्वा अर्जन उवाच --,अर्जन उवाच --,

मुख्य शब्द

knowledgebornignorance