16.1श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
।।16.1।।श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।
16.2श्रीकृष्ण
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।
ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam
।।16.2।।अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।
16.3श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।
tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā
bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata
।।16.3।।तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
16.4श्रीकृष्ण
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।16.4।।
dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha
ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm
।।16.4।।हे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
16.5श्रीकृष्ण
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।16.5।।
daivī sampad vimokṣhāya nibandhāyāsurī matā
mā śhuchaḥ sampadaṁ daivīm abhijāto ’si pāṇḍava
।।16.5।।दैवी-सम्पत्ति मुक्तिके लिये और आसुरी-सम्पत्ति बन्धनके लिये है। हे पाण्डव तुम दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुए हो, इसलिये तुम्हें शोक (चिन्ता) नहीं करना चाहिये।
16.6श्रीकृष्ण
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।16.6।।
dvau bhūta-sargau loke ’smin daiva āsura eva cha
daivo vistaraśhaḥ prokta āsuraṁ pārtha me śhṛiṇu
।।16.6।।इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवीका तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ ! तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार सुनो।
16.7श्रीकृष्ण
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।16.7।।
pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ
na śhauchaṁ nāpi chāchāro na satyaṁ teṣhu vidyate
।।16.7।।आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।
16.8श्रीकृष्ण
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।
asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram
aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam
।।16.8।।वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है।
16.9श्रीकृष्ण
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।
etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ
prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣhayāya jagato ’hitāḥ
।।16.9।।उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है।
16.10श्रीकृष्ण
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।
kāmam āśhritya duṣhpūraṁ dambha-māna-madānvitāḥ
mohād gṛihītvāsad-grāhān pravartante ’śhuchi-vratāḥ
।।16.10।।कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं।
16.11श्रीकृष्ण
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्िचताः।।16.11।।
chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ
kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ
।।16.11।।वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं।
16.12श्रीकृष्ण
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।
āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān
।।16.12।।वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।
16.13श्रीकृष्ण
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।
idam adya mayā labdham imaṁ prāpsye manoratham
idam astīdam api me bhaviṣhyati punar dhanam
।।16.13।।इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं और अब इस मनोरथको प्राप्त (पूरा) कर लेंगे।,इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना धन फिर हो जायगा।
16.14श्रीकृष्ण
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।16.14।।
asau mayā hataḥ śhatrur haniṣhye chāparān api
īśhvaro ’ham ahaṁ bhogī siddho ’haṁ balavān sukhī
।।16.14।।वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे। हम सर्वसमर्थ हैं। हमारे पास भोग-सामग्री बहुत है। हम सिद्ध हैं। हम बड़े बलवान् और सुखी हैं।
16.15श्रीकृष्ण
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।
āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā
yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ
aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ
prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau
।।16.15।।हम धनवान् हैं, बहुत-से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है? हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।
16.16श्रीकृष्ण
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।
aneka-citta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛtāḥ prasaktāḥ kāma-bhogeṣu patanti narake 'śucau
।।16.16।।कामनाओंके कारण तरह-तरहसे भ्रमित चित्तवाले, मोह-जालमें अच्छी तरहसे फँसे हुए तथा पदार्थों और भोगोंमें अत्यन्त आसक्त रहनेवाले मनुष्य भयङ्कर नरकोंमें गिरते हैं।
16.17श्रीकृष्ण
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।
ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ
yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam
।।16.17।।अपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं।
16.18श्रीकृष्ण
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।
ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ
mām ātma-para-deheṣhu pradviṣhanto ’bhyasūyakāḥ
।।16.18।।वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।
16.19श्रीकृष्ण
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।
tān ahaṁ dviṣhataḥ krūrān sansāreṣhu narādhamān
kṣhipāmy ajasram aśhubhān āsurīṣhv eva yoniṣhu
।।16.19।।उन द्वेष करनेवाले, क्रूर स्वभाववाले और संसारमें महान् नीच, अपवित्र मनुष्योंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता ही रहता हूँ।
16.20श्रीकृष्ण
असुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।16.20।।
āsurīṁ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani
mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṁ gatim
।।16.20।।हे कुन्तीनन्दन ! वे मूढ मनुष्य मेरेको प्राप्त न करके ही जन्म-जन्मान्तरमें आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अधिक अधम गतिमें अर्थात् भयङ्कर नरकोंमें चले जाते हैं।
16.21श्रीकृष्ण
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।16.21।।
tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ
kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet
।।16.21।।काम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।
16.22श्रीकृष्ण
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।16.22।।
etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥ
ācharaty ātmanaḥ śhreyas tato yāti parāṁ gatim
।।16.22।।हे कुन्तीनन्दन ! इन नरकके तीनों दरवाजोंसे रहित हुआ जो मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है।
16.23श्रीकृष्ण
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।।
yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥ
na sa siddhim avāpnoti na sukhaṁ na parāṁ gatim
।।16.23।। जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है।
16.24श्रीकृष्ण
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।
tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau
jñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi
।।16.24।।अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है -- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्र-विधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है।