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इस विषय के श्लोक

शरणागति

  • 23 श्लोक
2.7अर्जुन

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्िचतं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

।।2.7।। कायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

कर्मधर्ममनशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
2.49श्रीकृष्ण

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।2.49।।

dūreṇa hy-avaraṁ karma buddhi-yogād dhanañjaya buddhau śharaṇam anvichchha kṛipaṇāḥ phala-hetavaḥ

।।2.49।। बुद्धियोग-(समता) की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट है। अतः हे धनञ्जय ! तू बुद्धि (समता) का आश्रय ले; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं।

कर्मज्ञानयोगमनध्यानक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
3.30श्रीकृष्ण

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।3.30।।

mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-chetasā nirāśhīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ

।।3.30।। तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और संताप-रहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर।

कर्ममनवैराग्यक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
4.10श्रीकृष्ण

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।4.10।।

vīta-rāga-bhaya-krodhā man-mayā mām upāśhritāḥ bahavo jñāna-tapasā pūtā mad-bhāvam āgatāḥ

।।4.10।। राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित, मेरेमें ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे भाव- (स्वरूप-) को प्राप्त हो चुके हैं।

ज्ञानभयवैराग्यशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
4.20श्रीकृष्ण

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।।4.20।।

tyaktvā karma-phalāsaṅgaṁ nitya-tṛipto nirāśhrayaḥ karmaṇyabhipravṛitto ’pi naiva kiñchit karoti saḥ

।।4.20।। जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

कर्मवैराग्यक्रियाविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
4.42श्रीकृष्ण

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।

tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

।।4.42।। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग -(समता-) में स्थित हो जा, (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।

ज्ञानयोगजीवनविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
7.1श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।7.1।।

śhrī bhagavān uvācha mayyāsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśhrayaḥ asanśhayaṁ samagraṁ māṁ yathā jñāsyasi tach chhṛiṇu

।।7.1।। श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन।

योगमनसमर्पणध्यानक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
7.14श्रीकृष्ण

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14।।

daivī hyeṣhā guṇa-mayī mama māyā duratyayā mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te

।।7.14।। क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया बड़ी दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं।

7.15श्रीकृष्ण

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।7.15।।

na māṁ duṣhkṛitino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ māyayāpahṛita-jñānā āsuraṁ bhāvam āśhritāḥ

।।7.15।।   मायाके द्वारा अपहृत ज्ञानवाले, आसुर भावका आश्रय लेनेवाले और मनुष्योंमें महान् नीच तथा पाप-कर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।९

ज्ञानजीवनशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
7.29श्रीकृष्ण

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।7.29।।

jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam

।।7.29।।  जरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो  मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं।

कर्मज्ञानमृत्युक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
9.32श्रीकृष्ण

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।9.32।।

māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim

।।9.32।। हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

9.34श्रीकृष्ण

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।9.34।।

man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣhyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ

।।9.34।। तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। इस प्रकार मेरे साथ अपने-आपको लगाकर, मेरे परायण हुआ तू मेरेको ही प्राप्त होगा। ,

मनसमर्पणशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
11.38अर्जुन

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।।11.38।।

tvam ādi-devaḥ puruṣhaḥ purāṇas tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam vettāsi vedyaṁ cha paraṁ cha dhāma tvayā tataṁ viśhvam ananta-rūpa

।।11.38।। आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं। आप ही सबको जाननेवाले, जाननेयोग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।

ज्ञानविद्याशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
12.6श्रीकृष्ण

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ ananyenaiva yogena māṁ dhyāyanta upāsate

।।12.6।।परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं।

भक्तिकर्मयोगमनध्यानवैराग्यक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
12.11श्रीकृष्ण

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।12.11।।

athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān

।।12.11।।अगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।

कर्मयोगवैराग्यक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
13.26श्रीकृष्ण

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।13.26।।

anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ

।।13.26।।दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषोंसे) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुननेके परायण मनुष्य भी मृत्युको तर जाते हैं।

भक्तिज्ञानमृत्युशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
14.2श्रीकृष्ण

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।14.2।।

idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha

।।14.2।।इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते।

ज्ञानजीवनशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
15.4श्रीकृष्ण

ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।15.4।।

tataḥ padaṁ tat parimārgitavyaṁ yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ tam eva chādyaṁ puruṣhaṁ prapadye yataḥ pravṛittiḥ prasṛitā purāṇī

।।15.4।।उसके बाद उस परमपद-(परमात्मा-) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होनेपर मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ।

क्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
18.2श्रीकृष्ण

श्री भगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः।।18.2।।

śhrī-bhagavān uvācha kāmyānāṁ karmaṇāṁ nyāsaṁ sannyāsaṁ kavayo viduḥ sarva-karma-phala-tyāgaṁ prāhus tyāgaṁ vichakṣhaṇāḥ

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

कर्मक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
18.56श्रीकृष्ण

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।18.56।।

sarva-karmāṇy api sadā kurvāṇo mad-vyapāśhrayaḥ mat-prasādād avāpnoti śhāśhvataṁ padam avyayam

।।18.56।।मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।

कर्मजीवनक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
18.57श्रीकृष्ण

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।18.57।।

chetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ buddhi-yogam upāśhritya mach-chittaḥ satataṁ bhava

।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।

कर्मज्ञानयोगमनवैराग्यक्रियाशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
18.62श्रीकृष्ण

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।18.62।।

tam eva śharaṇaṁ gachchha sarva-bhāvena bhārata tat-prasādāt parāṁ śhāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śhāśhvatam

।।18.62।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति-(संसारसे सर्वथा उपरति-) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

शांतिशरणागतिशब्दार्थ एवं भाष्य
18.66श्रीकृष्ण

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।