श्री भगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।11.47।।
śhrī-bhagavān uvācha mayā prasannena tavārjunedaṁ rūpaṁ paraṁ darśhitam ātma-yogāt tejo-mayaṁ viśhvam anantam ādyaṁ yan me tvad anyena na dṛiṣhṭa-pūrvam
।।11.47।। श्रीभगवान् बोले -- हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसीने नहीं देखा है।