अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।
avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata
avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā
।।2.28।। हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?
विद्या
शब्दार्थ
avyakta-ādīni
unmanifest before birth
bhūtāni
created beings
vyakta
manifest
madhyāni
in the middle
bhārata
Arjun, scion of Bharat
avyakta
unmanifest
nidhanāni
on death
eva
indeed
tatra
therefore
kā
why
paridevanā
grieve
अनुवाद
Beings are unmanifest in their beginning, manifest in their middle state, O Arjuna, and unmanifest again in their end. What is there to grieve about?
— Swami Sivananda · meaning
The end and beginning of beings are unknown; we only see the intervening formations. So, what is there to grieve about?
— Shri Purohit Swami · simple
।।2.28।। हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?
— Swami Ramsukhdas · meaning
।।2.28।। हे भारत ! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है ?
— Swami Tejomayananda · simple
भाष्य
Acharya आदि शंकराचार्य · advaita
।।2.28।। अव्यक्तादीनि अव्यक्तम् अदर्शनम् अनुपलब्धिः आदिः येषां भूतानां पुत्रमित्रादिकार्यकरणसंघातात्मकानां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि प्रागुत्पत्तेः उत्पन्नानि च प्राङ्मरणात् व्यक्तमध्यानि। अव्यक्तनिधनान्येव पुनः अव्यक्तम् अदर्शनं निधनं मरणं येषां तानि अव्यक्तनिधनानि। मरणादूर्ध्वमप्यव्यक्ततामेव प्रतिपद्यन्ते इत्यर्थः। तथा चोक्तम् अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः। नासौ तव न तस्य त्वं वृथा का परिदेवना इति। तत्र का परिदेवना को वा प्रलापः अदृष्टदृष्टप्रनष्टभ्रान्तिभूतेषु भूतेष्वित्यर्थः।।दुर्विज्ञेयोऽयं प्रकृत आत्मा किं त्वामेवैकमुपालभे साधारणे भ्रान्तिनिमित्ते। कथं दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा इत्यत आह