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मेरो वृंदावन
राजविद्याराजगुह्ययोग
9.4श्रीकृष्ण

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।9.4।।

mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ

।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

जीवन

शब्दार्थ

mayā

by me

tatam

pervaded

idam

this

sarvam

entire

jagat

cosmic manifestation

avyakta-mūrtinā

the unmanifested form

mat-sthāni

in me

sarva-bhūtāni

all living beings

na

not

cha

and

aham

I

teṣhu

in them

avasthitaḥ

dwell

अनुवाद

All of this world is pervaded by Me in My unmanifest aspect; all beings exist within Me, but I do not dwell within them.

Swami Sivananda · meaning

The whole world is pervaded by Me, yet My form is not visible. All living beings have their being in Me, yet I am not confined by them.

Shri Purohit Swami · simple

।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।9.4।। यह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।9.4।। --,मया मम यः परो भावः तेन ततं व्याप्तं सर्वम् इदं जगत् अव्यक्तमूर्तिना न व्यक्ता मूर्तिः स्वरूपं यस्य मम सोऽहमव्यक्तमूर्तिः तेन मया अव्यक्तमूर्तिना? करणगोचरस्वरूपेण इत्यर्थः। तस्मिन् मयि अव्यक्तमूर्तौ स्थितानि मत्स्थानि? सर्वभूतानि ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि। न हि निरात्मकं किञ्चित् भूतं व्यवहाराय अवकल्पते। अतः मत्स्थानि मया आत्मना आत्मवत्त्वेन स्थितानि? अतः मयि स्थितानि इति उच्यन्ते। तेषां भूतानाम् अहमेव आत्मा इत्यतः तेषु स्थितः इति मूढबुद्धीनां अवभासते अतः ब्रवीमि -- न च अहं तेषु भूतेषु अवस्थितः? मूर्तवत् संश्लेषाभावेन आकाशस्यापि अन्तरतमो हि अहम्। न हि असंसर्गि वस्तु क्वचित् आधेयभावेन अवस्थितं भवति।।अत एव असंसर्गित्वात् मम --,

मुख्य शब्द

living