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मेरो वृंदावन
पुरुषोत्तमयोग
15.7श्रीकृष्ण

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।

mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati

।।15.7।।इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

मनजीवन

शब्दार्थ

mama

my

eva

only

anśhaḥ

fragmental part

jīva-loke

in the material world

jīva-bhūtaḥ

the embodied souls

sanātanaḥ

eternal

manaḥ

with the mind

ṣhaṣhṭhāni

the six

indriyāṇi

senses

prakṛiti-sthāni

bound by material nature

karṣhati

struggling

अनुवाद

An eternal portion of Myself having become a living soul in the world of life, draws to itself the five senses, with the mind as the sixth, abiding in Nature.

Swami Sivananda · meaning

It is only a very small part of My Eternal Self, which is the life of the universe, that draws around itself the six senses, with the mind being the last, which have their source in Nature.

Shri Purohit Swami · simple

।।15.7।।इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।15.7।। इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।15.7।। --,ममैव परमात्मनः नारायणस्य? अंशः भागः अवयवः एकदेशः इति अनर्थान्तरं जीवलोके जीवानां लोके संसारे जीवभूतः कर्ता भोक्ता इति प्रसिद्धः सनातनः चिरंतनः यथा जलसूर्यकः सूर्यांशः जलनिमित्तापाये सूर्यमेव गत्वा न निवर्तते च तेनैव आत्मना गच्छति? एवमेव यथा घटाद्युपाधिपरिच्छिन्नो घटाद्याकाशः आकाशांशः सन् घटादिनिमित्तापाये आकाशं प्राप्य न निवर्तते। अतः उपपन्नम् उक्तम् यद्गत्वा न निवर्तन्ते इति। ननु निरवयवस्य परमात्मनः कुतः अवयवः एकदेशः अंशः इति सावयवत्वे च विनाशप्रसङ्गः अवयवविभागात्। नैष दोषः? अविद्याकृतोपाधिपरिच्छिन्नः एकदेशः अंश इव कल्पितो यतः। दर्शितश्च अयमर्थः क्षेत्राध्याये विस्तरशः। स च जीवो मदंशत्वेन कल्पितः कथं संसरति उत्क्रामति च इति? उच्यते -- मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि प्रकृतिस्थानि स्वस्थाने कर्णशष्कुल्यादौ प्रकृतौ स्थितानि कर्षति आकर्षति।।कस्मिन् काले --,

मुख्य शब्द

mindlife