prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api
vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān
।।13.20।।प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।
जीवनक्रिया
शब्दार्थ
prakṛitim
material nature
puruṣham
the individual souls
cha
and
eva
indeed
viddhi
know
anādī
beginningless
ubhau
both
api
and
vikārān
transformations (of the body)
cha
also
guṇān
the three modes of nature
cha
and
eva
indeed
viddhi
know
prakṛiti
material energy
sambhavān
produced by
अनुवाद
Know that Nature (matter) and the Spirit are both beginningless, and know also that all modifications and qualities are born from Nature.
— Swami Sivananda · meaning
Know further that Nature and God have no beginning, and that differences in character and quality originate from Nature only.
— Shri Purohit Swami · simple
।।13.20।।प्रकृति और पुरुष -- दोनोंको ही तुम अनादि समझो और विकारों तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।
— Swami Ramsukhdas · meaning
।।13.20।। प्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।
— Swami Tejomayananda · simple
भाष्य
Acharya आदि शंकराचार्य · advaita
।।13.20।। --,प्रकृतिं पुरुषं चैव ईश्वरस्य प्रकृती तौ प्रकृतिपुरुषौ उभावपि अनादि विद्धि? न विद्यते आदिः ययोः तौ अनादी। नित्येश्वरत्वात् ईश्वरस्य तत्प्रकृत्योरपि युक्तं नित्यत्वेन भवितुम्। प्रकृतिद्वयवत्त्वमेव हि ईश्वरस्य ईश्वरत्वम्। याभ्यां प्रकृतिभ्याम् ईश्वरः जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयहेतुः? ते द्वे अनादी सत्यौ संसारस्य कारणम्।।न आदी अनादी इति तत्पुरुषसमासं केचित् वर्णयन्ति। तेन हि किल ईश्वरस्य कारणत्वं सिध्यति। यदि पुनः प्रकृतिपुरुषावेव नित्यौ स्यातां तत्कृतमेव जगत् न ईश्वरस्य जगतः कर्तृत्वम्। तत् असत् प्राक् प्रकृतिपुरुषयोः उत्पत्तेः ईशितव्याभावात् ईश्वरस्य अनीश्वरत्वप्रसङ्गात्? संसारस्य निर्निमित्तत्वे अनिर्मोक्षप्रसङ्गात् शास्त्रानर्थक्यप्रसङ्गात् बन्धमोक्षाभावप्रसङ्गाच्च। नित्यत्वे पुनः ईश्वरस्य प्रकृत्योः सर्वमेतत् उपपन्नं भवेत्। कथम् विकारांश्च गुणांश्चैव वक्ष्यमाणान्विकारान् बुद्ध्यादिदेहेन्द्रियान्तान् गुणांश्च सुखदुःखमोहप्रत्ययाकारपरिणतान् विद्धि जानीहि प्रकृतिसंभवान्? प्रकृतिः ईश्वरस्य विकारकारणशक्तिः त्रिगुणात्मिका माया? सा संभवो येषां विकाराणां गुणानां च तान् विकारान् गुणांश्च विद्धि प्रकृतिसंभवान् प्रकृतिपरिणामान्।।के पुनः ते विकाराः गुणाश्च प्रकृतिसंभवाः --,