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कर्मयोग
3.15श्रीकृष्ण

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।3.15।।

karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣhṭhitam

।।3.14 -- 3.15।। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न  वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।

कर्ममृत्युक्रिया

शब्दार्थ

karma

duties

brahma

in the Vedas

udbhavam

manifested

viddhi

you should know

brahma

The Vedas

akṣhara

from the Imperishable (God)

samudbhavam

directly manifested

tasmāt

therefore

sarva-gatam

all-pervading

brahma

The Lord

nityam

eternally

yajñe

in sacrifice

pratiṣhṭhitam

established

अनुवाद

Know that action comes from Brahma, and Brahma comes from the Imperishable. Therefore, the all-pervasive Brahma ever rests in sacrifice.

Swami Sivananda · meaning

All actions originate from the Supreme Spirit, which is Imperishable, and in sacrificial actions, the all-pervasive Spirit is consciously present.

Shri Purohit Swami · simple

।।3.14 -- 3.15।। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न  वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।3.15।। कर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्यापी ब्रह्म सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।3.15।। कर्म ब्रह्मोद्भवं ब्रह्म वेदः सः उद्भवः कारणं प्रकाशको यस्य तत् कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि विजानीहि। ब्रह्म पुनः वेदाख्यम् अक्षरसमुद्भवम् अक्षरं ब्रह्म परमात्मा समुद्भवो यस्य तत् अक्षरसमुद्भवम्। ब्रह्म वेद इत्यर्थः। यस्मात् साक्षात् परमात्माख्यात् अक्षरात् पुरुषनिःश्वासवत् समुद्भूतं ब्रह्म तस्मात् सर्वार्थप्रकाशकत्वात् सर्वगतम् सर्वगतमपि सत् नित्यं सदा यज्ञविधिप्रधानत्वात् यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।

मुख्य शब्द

actionperishact