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ज्ञानविज्ञानयोग
7.7श्रीकृष्ण

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।7.7।।

mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva

।।7.7।। हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

शब्दार्थ

mattaḥ

than me

para-taram

superior

na

not

anyat kiñchit

anything else

asti

there is

dhanañjaya

Arjun, conqueror of wealth

mayi

in me

sarvam

all

idam

which we see

protam

is strung

sūtre

on a thread

maṇi-gaṇāḥ

beads

iva

like

अनुवाद

There is nothing higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, like clusters of gems on a string.

— Swami Sivananda · meaning

O Arjuna! There is nothing higher than Me; all is strung on Me like rows of pearls on a thread.

— Shri Purohit Swami · simple

।।7.7।। हे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

— Swami Ramsukhdas · meaning

।।7.7।। हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।

— Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।7.7।। मत्तः परमेश्वरात् परतरम् अन्यत् कारणान्तरं किञ्चित् नास्ति न विद्यते अहमेव जगत्कारणमित्यर्थः हे धनञ्जय। यस्मादेवं तस्मात् मयि परमेश्वरे सर्वाणि भूतानि सर्वमिदं जगत् प्रोतं अनुस्यूतम् अनुगतम् अनुविद्धं ग्रथितमित्यर्थ दीर्घतन्तुषु पटवत् सूत्रे च मणिगणा इव।।केन केन धर्मेण विशिष्टे त्वयि सर्वमिदं प्रोतमित्युच्यते