डिजिटल वृंदावन
Digital Vrindavan
भक्तियोग
12.4श्रीकृष्ण

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4।।

sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

।।12.4।।जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

कर्ममनजीवन

शब्दार्थ

indriya-grāmam

all the senses

sarvatra

everywhere

sama-buddayaḥ

equally disposed

prāpnuvanti

achieve

mām

unto Me

eva

certainly

sarva-bhūtahite

all living entities' welfare

ratāḥ

engaged.

अनुवाद

Having restrained all the senses, being even-minded everywhere, and intent on the welfare of all beings, they verily come unto Me.

Swami Sivananda · meaning

Subduing their senses, viewing all conditions of life with an equal eye, and working for the welfare of all beings, they assuredly come to Me.

Shri Purohit Swami · simple

।।12.4।।जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।12.4।। इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।12.4।। -- संनियम्य सम्यक् नियम्य उपसंहृत्य इन्द्रियग्रामम् इन्द्रियसमुदायं सर्वत्र सर्वस्मिन् काले समबुद्धयः समा तुल्या बुद्धिः येषाम् इष्टानिष्टप्राप्तौ ते समबुद्धयः। ते ये एवंविधाः ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः। न तु तेषां वक्तव्यं किञ्चित् मां ते प्राप्नुवन्ति इति ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् (गीता 7।18) इति हि उक्तम्। न हि भगवत्स्वरूपाणां सतां युक्ततमत्वमयुक्ततमत्वं वा वाच्यम्।।किं तु --,

मुख्य शब्द

workmindlife