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मेरो वृंदावन
अक्षरब्रह्मयोग
8.12श्रीकृष्ण

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।8.12।।

sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām

।।8.12 -- 8.13।। (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका  उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।

मनध्यानजीवनक्रिया

शब्दार्थ

sarva-dvārāṇi

all gates

sanyamya

restraining

manaḥ

the mind

hṛidi

in the heart region

nirudhya

confining

cha

and

mūrdhni

in the head

ādhāya

establish

ātmanaḥ

of the self

prāṇam

the life breath

āsthitaḥ

situated (in)

yoga-dhāraṇām

the yogic concentration

अनुवाद

Having closed all the gates, confined the mind in the heart, and fixed the life-breath in the head, engage in the practice of concentration.

Swami Sivananda · meaning

Closing the gates of the body, drawing the forces of his mind into the heart, and, by the power of meditation, concentrating his vital energy in the brain;

Shri Purohit Swami · simple

।।8.12 -- 8.13।। (इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका  उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।

Swami Ramsukhdas · meaning

।।8.12।। सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।

Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।8.12।। --,सर्वद्वाराणि सर्वाणि च तानि द्वाराणि च सर्वद्वाराणि उपलब्धौ तानि सर्वाणि संयम्य संयमनं कृत्वा मनः हृदि हृदयपुण्डरीके निरुध्य निरोधं कृत्वा निष्प्रचारमापाद्य तत्र वशीकृतेन मनसा हृदयात् ऊर्ध्वगामिन्या नाड्या ऊर्ध्वमारुह्य मूर्ध्नि आधाय आत्मनः प्राणम् आस्थितः प्रवृत्तः योगधारणां धारयितुम्।।तत्रैव च धारयन् --,

मुख्य शब्द

mindmeditatlifeact