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कर्मयोग
3.10श्रीकृष्ण

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।।3.10।।

saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥ anena prasaviṣhyadhvam eṣha vo ’stviṣhṭa-kāma-dhuk

।।3.10 -- 3.11।। प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।

शब्दार्थ

saha

along with

yajñāḥ

sacrifices

prajāḥ

humankind

sṛiṣhṭvā

created

purā

in beginning

uvācha

said

prajā-patiḥ

Brahma

anena

by this

prasaviṣhyadhvam

increase prosperity

eṣhaḥ

these

vaḥ

your

astu

shall be

iṣhṭa-kāma-dhuk

bestower of all wishes

अनुवाद

The Creator, having in the beginning created mankind together with sacrifice, said, "By this shall you propagate; let this be the milch cow of your desires—the cow that yields all the desired objects."

— Swami Sivananda · meaning

In the beginning, when God created all beings through the sacrifice of Himself, He said to them: "You can procreate through sacrifice, and it shall satisfy all your desires."

— Shri Purohit Swami · simple

।।3.10 -- 3.11।। प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।

— Swami Ramsukhdas · meaning

।।3.10।। प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।

— Swami Tejomayananda · simple

भाष्य

Acharya आदि शंकराचार्य · advaita

।।3.10।। सहयज्ञाः यज्ञसहिताः प्रजाः त्रयो वर्णाः ताः सृष्ट्वा उत्पाद्य पुरा पूर्वं सर्गादौ उवाच उक्तवान् प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवः वृद्धिः उत्पत्तिः तं कुरुध्वम्। एष यज्ञः वः युष्माकम् अस्तु भवतु इष्टकामधुक् इष्टान् अभिप्रेतान् कामान् फलविशेषान् दोग्धीति इष्टकामधुक्।।कथम्